जुगुल्डी गांव में मां ज्वालामुखी देवी की पूजा को उमड़े प्रवासी ग्रामीण

चैत्र और शारदीय नवरात्र में देश-विदेश से पैतृक गांव पहुंचते हैं प्रवासी ग्रामीण और ध्याणियां
करीब 300 वर्ष पुरानी है मां ज्वालामुखी देवी की पूजा की परंपरा
कालरात्रि पर कालिका स्वांग और पांडव नृत्य बना आकर्षण का केंद्र
उत्तरकाशी, डुंडा ब्लॉक के जुगुल्डी गांव में मां ज्वालामुखी देवी के प्रति अटूट आस्था नवरात्र में ग्रामीणों को अपनी जड़ों से जोड़ती है। मां की आराधना के लिए देश-विदेश में रह रहे प्रवासी ग्रामीण और विवाहित ध्याणियां हर साल चैत्र और शारदीय नवरात्र में पैतृक गांव पहुंचते हैं। इन दिनों गांव में पूजा-अर्चना के साथ पारंपरिक धार्मिक आयोजनों की रौनक है।
ग्राम प्रधान भीम सिंह पंवार के अनुसार, करीब 300 वर्ष पूर्व खेत में हल चलाते समय एक मूर्ति निकली थी। वेदपाठियों और कुल पुरोहितों ने इसे मां ज्वालामुखी देवी का स्वरूप बताया, जिसके बाद मूर्ति को मंदिर में स्थापित किया गया। तभी से ग्रामीण मां को अपनी आराध्य देवी मानकर विधि-विधान से पूजा करते आ रहे हैं। समय के साथ यह परंपरा गांव की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान बन गई।
नवरात्र में मंदिर में विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। प्रवासी ग्रामीण और ध्याणियां मां की सेवा-भक्ति में शामिल होकर परिवार और क्षेत्र की सुख-समृद्धि की कामना करते हैं। अपनी आराध्य देवी के प्रति आस्था उन्हें हर साल पैतृक गांव तक खींच लाती है।

कालरात्रि पर कालिका स्वांग ने मोहा मन
शनिवार को नवरात्र की सप्तमी पर कालरात्रि पूजन के अवसर पर गांव में कालिका स्वांग और पांडव नृत्य का आयोजन हुआ। कालिका स्वांग देखने के लिए ग्रामीणों के साथ आसपास के क्षेत्रों से भी लोग पहुंचे। इस दौरान पंवार जाति के एक व्यक्ति पर मां काली अवतरित होने की मान्यता के बीच उन्होंने विकराल रूप धारण कर नृत्य किया। पारंपरिक प्रस्तुति श्रद्धालुओं के आकर्षण का प्रमुख केंद्र रही।
गांव के कुल पुरोहित रघुवीर नैथानी और पृथ्वी दत्त नैथानी ने बताया कि कालिका स्वांग धार्मिक आस्था और लोक परंपरा से जुड़ा आयोजन है, जो पीढ़ियों से चला आ रहा है। ऐसे आयोजन गांव की सांस्कृतिक विरासत को जीवंत रखने के साथ नई पीढ़ी को अपनी परंपराओं से जोड़ने का भी माध्यम हैं।
फोटो कैप्शन: जुगुल्डी गांव में मां ज्वालामुखी देवी के दर्शन और पूजा-अर्चना करते श्रद्धालु।

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