ठांडी गांव में भेड़ों कू तमाशू’ मेले में उमड़ी भीड़,रैथल गांव के भेड़ मेले में किया रासौ नृत्य

– ठांडी गांव में हर तीसरे वर्ष आयोजित होता है भेड़ो का मेला
उत्तरकाशी। गाजणा क्षेत्र के ठांडी गांव में आयोजित तीन दिवसीय पौराणिक भेड़-बकरियों के मेले ‘भेड़ों कू तमाशू’ में गाजणा पट्टी के ग्रामीण बड़ी संख्या में पहुंचे। ग्रामीणों ने बोलिया राजा मंदिर के चारों से भेड़-बकरियों को घुमाया। साथ ही देवी देवताओं से क्षेत्र की खुशहाली की कामना की।

ठांडी गांव में त्रिवार्षिक भेड़ों के मेले में हरिमहाराज, बोलिया राजा, कालीनाग, ओणेश्वर, ज्वालपा माता, दुधयाड़ी देवी, नन्दा देवी, भद्रकाली, गुरू चौंरंगीनाथ की देव डोलियां पहुंची। इसके बाद भेड़ पालक अपनी भेड़-बकरियों को लेकर गांव आए। सबसे पहले भेड़ों की ऊन की कटाई की गई। इसके बाद भेड़ों को गांव तथा मंदिर के चारों ओर घुमाया गया। इस मौके पर गाजणा पट्टी के ग्रामीणों ने स्थानीय बाद्यय यंत्रो की थाप पर जमक रासौ नृत्य किया और मंदिर मेले में पहुंचे सभी देवी देवताओं से क्षेत्र की सुख समृद्धि का आशीर्वाद लिया। कार्यक्रम में बतौर मुख्यतिथि पहुंचे गंगोत्री विधायक सुरेश चौहान ने आयोजन समिति को बधाई दी ओर कहा कि यह मेला हमारी सदियों पुरानी लोक आस्था, धार्मिक परंपराओं और सांस्कृतिक विरासत का जीवंत प्रतीक है। ऐसे आयोजन हमारी नई पीढ़ी को अपनी जड़ों, परंपराओं और पहाड़ की समृद्ध सांस्कृतिक पहचान से जोड़ने का एक सशक्त माध्यम है। ग्रामीण अनिल सेमवाल,कैलाश नेगी ने बताया कि यह क्षेत्र का प्रसिद्ध पौराणिक मेला है, जिसे सदियों से मनाते आ रहे हैं। जिसमें गांव से दूर-दराज रहने वाले सभी ग्रामीण शामिल होने के लिए पहुंचते हैं। इस मेले में विभिन्न पकवानो का भोग बनाकर देवताओ को चढ़ाया जाता है।
रविवार को मेले में मुख्यमंत्री के गढ़वाल समन्वयक किशोर भट्ट, प्रधान भरत सिंह चौहान,अनिल सेमवाल,कैलाश नेगी,सुंदर सिंह राणा,अतर सिंह रावत,प्रवेश बिष्ट,मालचंद राणा,मायाराम आदि मौजूद रहे।
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रैथल गांव के भेड़ मेले में किया रासौ नृत्य
दूसरी ओर भटवाड़ी ब्लॉक के गोट विलेज के नाम से प्रसिद्ध रैथल गांव में रविवार को पारंपरिक भेड़ों का मेला धूमधाम और उत्साह के साथ मनाया गया। मेले में बड़ी संख्या में ग्रामीणों के साथ भेड़पालक अपनी भेड़ों को लेकर पहुंचे। इस दौरान ग्रामीणो ने सोमेश्वर देवता व मां जगदम्बा की विधिवत पूजा अर्चना की और अपने परिवार एवं क्षेत्र की कुशलता की कामना की। मेले में ग्रामीणों, महिलाओं एवं युवाओ ने ढोल दमाऊ की थाप पर रासौ नृत्य किया।

छह महीने तक मखमली बुग्यालों में प्रवास करने वाले भेड़ पालकों ने गांवों की ओर रुख करना शुरू कर दिया है। रविवार को भेड़ पालकों के लौटने पर रैथल गांव में भेड़़ो का मेला आयोजित किया गया। मेले का प्रमुख आकर्षण सुदूर बुग्याली क्षेत्रों से लाई गई भेड़ों की टोलियां रहीं, जिन्होंने विधिवत रूप से भगवान समेश्वर महाराज एवं मां जगदम्बा की परिक्रमा की। आस्था और लोक परंपरा से जुड़े इस मेले में बड़ी संख्या में ग्रामीण शामिल हुए। कार्यक्रम में शामिल हुए पूर्व विधायक विजय पाल सजवाण ने कहा कि रैथल गांव टकनौर क्षेत्र की समृद्ध संस्कृति, लोक परंपराओं और धार्मिक विरासत के संरक्षण एवं संवर्धन में सदैव अग्रणी रहा है। यहां तीज-त्योहारों और पारंपरिक आयोजनों को जिस उत्साह, श्रद्धा एवं सामूहिक सहभागिता के साथ मनाया जाता है, वह हमारी भावी पीढ़ियों को अपनी जड़ों और सांस्कृतिक विरासत से जोड़ने का प्रेरणादायी माध्यम है। उन्होंने कहा कि भेड़ मेला केवल एक धार्मिक एवं सांस्कृतिक आयोजन नहीं, बल्कि हमारी पौराणिक परंपराओं, ग्रामीण जीवनशैली और बुग्याली संस्कृति का जीवंत प्रतिबिंब है। ऐसे आयोजनों के माध्यम से हमारी लोक संस्कृति और विरासत को संरक्षण मिलता है तथा युवा पीढ़ी अपनी परंपराओं और सांस्कृतिक मूल्यों से परिचित होती है।
मेले में भाजपा जिलाध्यक्ष नागेंद्र चौहान, दयारा पर्यटन विकास समिति के अध्यक्ष मनोज राणा, खुशहाल नेगी,जयवीर चौहान,कलम सिंह राणा, घनानंद नौटियाल, पंचमालगुजार किशन सिंह राणा, राजकेंद्र थनवान, विपिन राणा, मनवीर रावत, ग्राम प्रधान बुद्धि लाल, क्षेत्र पंचायत सदस्य मोहन सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालु एवं क्षेत्रवासी उपस्थित रहे।
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इसलिए मनाया जाता है भेड़ों का मेला
ग्रामीणों की भेड़ 6 महीने तक जंगलों के बुग्याल में चरने के लिए जाती हैं। छह माह के बाद सितंबर महीने से ऊंचाई वाले बुग्यालों में अत्यधिक ठंड होने के कारण भेड़ ग्रामीण क्षेत्रों में वापस लौटने लगती हैं। भेड़ 6 महीने तक अच्छी चारा पत्ती चुगती हैं. सर्दियों यानी पतझड़ के मौसम में भेड़ गांवों में लौट आती हैं तो ग्रामीण भेड़ों के आने की खुशी और क्षेत्र की सुख समृद्धि के लिए पुरातन काल से इसको भेड़ों के मेले के रूप में मनाते हैं।
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